होली के रंग भरे त्यौहार से तो आप सभी वाकिफ हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व बहुत ही उल्लास का पर्व होता है। इसमें प्रेम व भाईचारे के रंग तो दिखाई देते ही हैं साथ ही होली का धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है। होली को मनाने की परंपरा कब शुरू हुई इसके ऐतिहासिक व प्रामाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलते लेकिन होली के मनाने के पिछे जो कारण हैं, उन से जुड़ी कथाएं हिंदू धर्म ग्रंथों में जरूर मिलती हैं।

how to celebrate eco friendly holi



» हानिकारक होते है केमिकल रंग ?

होली के इस त्यौहार पर होली के रंग का भी एक बड़ा महत्त्व है. होली के रंग पहले गुलाल रंग ज्यादा होते थे. जो त्वचा के लिए भी लाभकारी थे जिनका कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं था. लेकिन आज के समय केमिकल वाले रंग बाजार में ज्यादा मिलते है जिनसे त्वचा को बहुत नुकसान होता है. कुछ जगह होली रंगों के साथ साथ कीचड़ और वार्निश से भी खेली जाती है होली में रंग खेले बगैर रहें तो होली एकदम अधूरी सी लगती है। होली में कई प्रकार के रंगों का प्रयोग होता है, जिनका असर कई दिनों तक कम नहीं होता है। बेशक रंग खेलने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन ये रंग स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। बाजार के रंगों में इतना ज्यादा केमिकल का प्रयोग होता है कि वह हेल्थ के लिए बहुत खतरनाक होता है। तो इसके लिए आपलोग इकोफ्रैंडली होली खेल सकते हैं !


» इको फ्रेंडली कैसे खेले ?

इकोफ्रैंडली होली का सिर्फ यह मतलब नहीं होता की आप सिर्फ रंग बदल दें बल्कि आपको ये बात भी ध्यान रखनी चाहिए की आपकी होली खेलने के वजह से किसी को कोई नुक्सान तो नहीं हो रहा, यहाँ तक की जानवरो को भी !
कई बार हमलोग होली खेलते रहजाते है और उससे आसपास के जानवरो पर बुरा असर परता है तो आपको ये बात भी ध्यान रखनी है की आपके होली मानाने से किसी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा !

होली के वजह से जल प्रदुषण के साथ साथ जल की समस्या भी उत्पन्न होती हैं तो आपसे निवेदन रहेगा को आप सिर्फ प्राकृतिक गुलाल से ही होली खेले और सही मायने में यही होली होती हैं

आजकल मार्किट में केमिकल वाले रंग बहुत ही ज्यादा मात्रा में आ रही हैं और हमलोग जब उस रंग से होली खेलते है तो उससे हमारे त्वचा पर बहुत ही गहरा साइड इफ़ेक्ट परता है और हम त्वचा रोग से पीड़ित हो सकते है तो खाश करके आपको ये बात ध्यान रखनी चाहिए की आप केमिकल वाली रंगो का प्रयोग नहीं करें !